अष्टान्हिका महापर्व महोत्सव का चतुर्थ दिवस

अष्टान्हिका महापर्व महोत्सव का चतुर्थ दिवस

Fourth day of the Ashtanhika Mahaparva Festival

Fourth day of the Ashtanhika Mahaparva Festival

64 आर्घ्यों से किया क्रोध, मान, माया और लोभ का नाश 

चंडीगढ़, 24 जुलाई। श्री दिगम्बर जैन मंदिर, सेक्टर-27 बी, चंडीगढ़ में अष्टान्हिका महापर्व के पावन अवसर पर आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं शांति महायज्ञ का चतुर्थ दिवस अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। प्रातः 6:30 बजे भगवान जिनेन्द्र देव के अभिषेक एवं मुख्य मंदिर तथा विधान मंडप में शांतिधारा के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके उपरांत ब्रह्मचारिणी आशा दीदी के सान्निध्य में मंगलाचरण, पूजन तथा सिद्धचक्र महामंडल विधान की निर्धारित विधियाँ संपन्न हुईं। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने विधान में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया तथा विश्व शांति, समाज के कल्याण एवं आत्मकल्याण की मंगलकामना की।आज कि शांतिधारा का सौभाग्य श्री धर्म बहादुर जैन , श्री प्रमोद जैन व् श्री राजा बहदुर सिंह जैन को प्राप्त हुआ।  
अपने प्रवचनों में ब्रह्मचारिणी आशा दीदी ने अष्टान्हिका महापर्व के चतुर्थ दिवस के विशेष महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस दिन सिद्धचक्र महामंडल विधान में समर्पित किए जाने वाले 64 अर्घ्यों का जैन धर्म में अत्यंत गहरा आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व है। उन्होंने कहा कि चौथे दिन अर्पित किए जाने वाले ये 64 अर्घ्य, 64 ऋद्धियों के प्रतीक हैं।
दीदी ने बताया कि जैन दर्शन के अनुसार जब कोई मुनिराज कठोर तप, संयम एवं आत्म-साधना करते हैं, तब उनकी आत्मा में विशेष दिव्य शक्तियाँ प्रकट होती हैं, जिन्हें ऋद्धियाँ कहा जाता है। ये 64 प्रकार की दिव्य सिद्धियाँ हैं, जिनमें केवलज्ञान (भूत, वर्तमान एवं भविष्य का संपूर्ण ज्ञान), विक्रिया ऋद्धि (शरीर का आकार बदलने की अलौकिक शक्ति) सहित अनेक आध्यात्मिक विभूतियाँ सम्मिलित हैं। इन 64 अर्घ्यों के माध्यम से श्रद्धालु उन ऋद्धिधारी मुनिराजों के गुणों, तप, संयम एवं आत्मबल का स्मरण एवं अर्चन करते हैं।
उन्होंने कहा कि इन अर्घ्यों को समर्पित करते समय प्रत्येक श्रद्धालु यह मंगल भावना करता है कि उसके भीतर विद्यमान क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे समस्त कषाय समाप्त हों तथा आत्मा कर्मों के बोझ से मुक्त होकर सिद्धत्व की दिशा में अग्रसर हो।
अपने प्रवचन में दीदी ने आचार्य परंपरा में वर्णित मुनि विष्णुकुमार का प्रेरणादायी प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उन्होंने अपनी विक्रिया ऋद्धि के प्रभाव से 700 मुनिराजों की रक्षा की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैन सिद्धांतों के अनुसार मुनिराज अपनी ऋद्धियों का प्रदर्शन नहीं करते। यद्यपि मुनि विष्णुकुमार ने यह कार्य केवल जैन धर्म और साधु-संघ की रक्षा के लिए किया था, फिर भी उन्होंने रूप परिवर्तन करने के लिए गहन पश्चाताप (प्रायश्चित) किया। इसके पश्चात उन्होंने पुनः कठोर दिगम्बर साधना एवं आत्माराधना करते हुए समस्त कर्मों का क्षय किया और अंततः मोक्ष पद को प्राप्त किया। यह प्रसंग त्याग, विनम्रता और आत्मशुद्धि का अनुपम संदेश देता है।
आज का विधान प्रातः लगभग 10:00 बजे मंगलमय वातावरण में संपन्न हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंदिर परिसर भगवान जिनेन्द्र के जयघोष, मंत्रोच्चारण एवं भक्तिभाव से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सिद्धचक्र महामंडल विधान में भाग लेकर धर्माराधना की तथा समस्त विश्व में सुख, शांति और मंगल की कामना की।
इस अवसर पर श्री दिगम्बर जैन मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री धर्म बहादुर जैन, महासचिव श्री संत कुमार जैन, सह सचिव श्री शरद जैन , सह कोषाध्यक्ष नीरज जैन ,श्री नवरत्तन जैन, श्री प्रमोद जैन सहित समिति के कई पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए अधिक से अधिक संख्या में धर्माराधना में भाग लेने का आह्वान किया। आज का भोजन श्री इंद्रेश जैन रानी जैन परिवार कि और से था।